Search This Blog
Wednesday, October 31, 2012
पाता हूँ उसको
आज फिर सुबह हुई,
सूरज फिर उगा सुस्ती के साथ,कोहरे छानते रहे धूप को,
आज फिर ठंडक घुल गई है फिजाओं में,
पत्तों पर ओस की बूंदें,
गिरने के लिए ठहरी हुयी हैं.
आज फिर नदी बुलाती मुझको,
उसके बगल बैठा..
बुनता-बीनता रहा रहूं ज़िन्दगी,
पेड़ पुकारते, छाँव का देते लालच,
आज ही.
सबकुछ कल की तरह ही है,
| Coutsey : Google Images |
सुनता हूँ प्रकृति का हर एक नाद.
आज जिसके हाथों की नमी,
काफूर हो रही जेहन से .
पाता हूँ उसको,
धरती के हर सुन्दर सृजन में.
निवेदन
सबकी अपनी डुगडुगी
सबका अपना संगीत सबने सजाये...
अपने स्वर अपने गीत
आओ,
आओ, सुध-बुध से अपने न्याय करें
आओ,
आओ, अर्थ और लय को,
आओ,
आओ, सूर और ताल के,
कल-कल झरने बहायें.
आओ,
आओ, एकमेक राग के तान में,
मैं, तुम, हम, वो की दीवार ढहाएं.
आओ,
आओ, मिलके,
"अनहद नाद" बनाएं.
कहीं ऐसा न हो,
कि कबीरा बौरा जाए
बीच बाज़ार में.
शब्दहीन पल
उगते
सूर्यास्त में,
डूबा
हूँ मैं,मन गोते लगाता,
चिड़ियों की चहचहाट में.
सांसें रोक लीं,
ताकि उलझ-थम जाएँ शब्दहीन पल.
सूरज एक पीला संतरा,
कर
रहा साफ..मेरी दिक्कत भरी आँखें.
सूरज एक गोल रंग की टिकिया ,
घोल रहा नदी को अपने रंग में.
मन भारी-हल्का सा है,
हल्का-भारी सा!
करता गुहार
तुम होती,
तुम्हारी नर्म हाथें होतीं,
हमागोश होते, लम्हों में कम्पन होती.
और,
सूरज शर्म के मारे,
अलविदा कहते-कहते,
सुर्ख लाल हो जाता.
Tuesday, October 30, 2012
बच्चे और शब्द
कहते हैं,
बच्चे के पैदा होते ही,माँ को मिलती है एक भाषा,
भाषा जो केवल उसकी और
उसके उपज की दाय है.
बच्चा सीखता है बोलना,
माँ मुस्कुरा देती है,
आँखों से, होंठों से,
माँ गुस्सा करती है,
बच्चा सहम जाता है,
आँखों से, केवल आँखों से
मानों "नाल" का कटना
महज़ औपचारिकता हो
बच्चा करता है इजाद,
स्वरों के खिलौनों से एक भाषा,
और माँ निश्चिंत, मानों
कोई पूर्वज्ञान हो.
चाकू,
और बच्चा चाकू, डर और प्याज ले आता है,
प्याज,
और बच्चा आँखें मलने लगता है.
बिल्ली,
और वह उठाने लगता है बिल्ली को,
रोटी,
और उसमें मलाई-चीनी लगी गोल-गोल उसके हाथ में.
कई भावों का गट्ठर लिए होता है,
एक शब्द
बच्चे भाषा नहीं दिल
बोलते हैं,
एक आवश्यक संगीत,
जिसकी तारें माँ के गर्भ
में,
तैयार होती हैं.
मुलायम गर्दन
को उठा जब तकता है शिशु
अपलक माँ को,
मानों सोख रहा हो एक तरल
भाषा
ऐसे गहन-प्रेम की भाषा
जिसकी तालीम का अता-पता
नहीं.
बार-बार फिर से
तुम मुझसे सहमत नहीं होगे,
और मैं तुम्हारी मुखालिफत चाहता भी नहीं,जिस देश में,
इंसान को,
आवारा कुत्तों की तरह बरता जाये,
जहां सिर्फ डरपोकों का बसर हो,
जहां किसी दैवीय हस्तक्षेप के इंतज़ार में...
हम दिन, दशक और सदियाँ गुज़ार देते हैं.
वहाँ हर बार मेरे देश को जलना पड़ता है
उसकी राख की सुलगन बाक़ी ही होती है कि...
कोई और अपनी प्रयोगशाला समझ...
एक और बम गिरा जाता है.
मानों एक कोठा हो जहां...
शादी से पहले हर कोई अपने हाँथ आजमा लेता है.
कि हम फिर से सुर्खियाँ पढ़ते हैं
मानों कोई "कॉमिक" पढ़ रहे हों
कि हम फिर से भौंचक रह जाते हैं
कि “ऐसा” फिर से हो गयाकि हम फिर से अमन-चैन के गीत गाते हैं
जिसमें “सुलगन” और “आह” के नामों-निशाँ नहीं...
कि हम फिर से जंतर-मंतर पर धरना देते हैं
मसलन कोई “नौकरी” कर रहे हों
कि हम फिर कुछ मोमबत्तियां जलाते हैं
और गला देते हैं अपने दिलों का “गुस्सा”
कि हमें फिर से लगता है की इंटरनेटी-क्रान्ति
सब “ठीक-ठाक” कर देगा
और दोहराते रहते हैं इस "फिर" के सिलसिले को.
जहां के पत्रकार अपने देश पर हुए बलात्कार
को मुनाफे के एवज़ में
बार-बार दिखाते हैं
भूखे कुत्ते की तरह हम अपने स्वामी (पश्चिमी देशों) का मूंह देखते हैं
कि वह हमें खाना दे और पीठ सहलाये
और हम शांतिपूर्ण होने की झूठी आत्म-तुष्टि
को न्यायोचित ठहरा सकें
नैतिकता, जो सदियों से हमें परोसी गयी है
का सहारा ले अपनी बुझदिली को सहनशक्ति की संज्ञा दें
हमारे गृह-मंत्री हर एक हादसे के बाद
लोगों की तारीफ़ करते नहीं अघाते
कि लोग "फिर से काम पर जाने लगे हैं"
कि पुलिस ने "फिर से बहादुरी से काम लिया"
और एक-दस लाख मुआवज़ा दे, बंद कर दी जाती है
रिपोर्ट और उनसे जुडी जिंदगियों की फाईल
कि यह भद्दा मज़ाक है
मेरे-हमारे देश के साथ
कि सिखाया जाता है हमें बार-बार
संस्कारों-नैतिकताओं के नाम पर
चुप-रहना
और
किसी जादुई हस्तक्षेप का इंतज़ार करना
कि दर्जन -धमाकों के बाद भी
"हमें हिम्मत नहीं खोनी चाहिए"..."शांति फिर कायम होगी"
तो यह जान लो
इस देश में तुम मरोगे
किसी रोग या बीमारी से नहीं
वरन किसी बम के फटने से
और तुम-हम जैसा ही कोई और
किसी क्रिकेट खिलाडी या फिल्मी सितारे
के नजरिये को सर-आँखों पर रखेगा
सवाल यह नहीं कि इसके आगे क्या होगा
अहम् यह होगा कि
कैसे कुचल-मसल दिया जाये उनको
जो कुलबुलाते हैं कभी-कभी बदहवासी में,
जिनके कहने-सुनने-करने से
तुम्हारी कान पर जूँ रेंग जाते हैं.
तुम्हारे आराम में खलल पड़ता है…
बार-बार फिर से
Monday, October 29, 2012
रूहानी इश्क
अब हम वक़्त गुज़ारते हैं..
हाथों-होठों को सहलाते-सहलाते,बेमतलब की बातों में हँसते-हँसाते,
हम गुज़ारते हैं वक़्त...
![]() |
| Courtsey : Google Images |
जिस्म का एक होना ज़रूरी नहीं…
ज़रूरी होता है केवल एक पहलू….
महज़ साँसों से साँसों का छुअन…
और वक़्त के पांवों में ज़ंजीर बाँधे नहीं बँधती...
धौंकनी की तरह वक़्त पिघलता-फिसलता चलता है.
बेतरह दो आवारा दिल...
इसी,
रूहानी इश्क,
में
वक़्त को क़ैद करने की...झूठी तसल्ली पाते हैं.
दिन से शाम, शाम से रात.
Subscribe to:
Posts (Atom)
