Search This Blog

Monday, October 29, 2012

रूहानी इश्क


अब हम वक़्त गुज़ारते हैं..
हाथों-होठों को सहलाते-सहलाते,
बेमतलब की बातों में हँसते-हँसाते,
हम गुज़ारते हैं वक़्त...
Courtsey : Google Images
यह, वह वक़्त है...जब...
जिस्म का एक होना ज़रूरी नहीं
ज़रूरी होता है केवल एक पहलू….
महज़ साँसों से साँसों का छुअन
और वक़्त के पांवों में ज़ंजीर बाँधे नहीं बँधती...
धौंकनी की तरह वक़्त पिघलता-फिसलता चलता है.





बेतरह दो आवारा दिल...         
इसी,
रूहानी इश्क,
में
वक़्त को क़ैद करने की...
झूठी तसल्ली पाते हैं.
दिन से शाम, शाम से रात.

 

आखिरी पड़ाव


अपने पक्के मकान के छज्जे पर
खड़े-खड़े सोचता हूँ,
इन दिनों सोचता रहा हूँ,
ये किस मुकाम पर आ पहुँचा हूँ,
कि हालात खदेड़ते हैं सपनों की तरफ,
और सपने हैं कि,
फ्यूज़ होती बल्ब की तरह लुका-छिपी खेलते हैं.
सोचता हूँ,
ज़िदगी मेरी कैसी कटी,
 
 
Courtsey : Google Images
क्या धुप में सूखते ओस की तरह,
या,
एक चींटी की तरह,
जिसके हाथ शक्कर का एक बोरा लग गया हो.
सोचता हूँ,
तो दोनों लगते हैं,
कभी वक्त यूँ ही बिता, कभी बिताना पड़ा.
सुख की छिड़कन के साथ दुःख का रिसाव भी मिला.
पूरे जीवन का कैनवास,
एक मध्यम-वर्गीय पुरुष का,
जिसे अपने ही घर में,
रिश्तों की दुहाई दे
एक कोना थमा दिया गया.
जो बहरा नहीं,
पर कम सुनने का बहाना करना पड़ा.
जिसके चुप रहने को विकट ज्ञानका नाम दिया गया,
जिसकी झुर्रियों और दागों को अनुभव की संज्ञा दी गई,
और,
एक पुराने मेडल की तरह बार-बार लोगों के सामने पेश किया गया
कि,
देखो ये हैं सफल व्यक्ति, जीवन के सारे मौसम इन्होने करीब से देखें हैं

सारी उम्र फिक्रामस्ती में गुज़ारी ज़िंदगी
अब एक उमसते जेल की तरह लग रही है
और आखिरी पड़ाव पर
बालकॉनी पर चाय पर चाय पीना,
बासी अखबार बार-बार पढ़ना
बच्चों के बच्चों का स्टेपनी बनना,
बच्चों को खेलते मुस्काना, खुश होना, बच्चा होना
बदलते ज़माने पर अफसोस करना
और
बची साँसों का इंतज़ार करना
महज़ यही सब बच गया है
जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर.
 

"माँ"



माँ वह,
जिसके प्रेम से,
मजबूत कुछ नहीं।
जो कबूतर की तरह चुगती है,
हमारी मुश्किलें।
जिसका प्रेम, एक दरिया है,
जो बारहमासी है।
जो हमारी गिरहों को सुलझाने में,
उलझाती जाती है अपना जीवन।
जिसका अपनोंको प्रार्थानाओं में रखना,
जीवन जीना है।
माँ,
वह शाश्वत लोरी है जिसका गुनगुनाना,
सारे मैल धो देता है।
एक ऐसा खिला फूल है, जो दुःख और सुख,
दोनों में नहीं मुरझाता।
माँ वह,
जिसकी अबोध हँसी में,
मिलते हैं सारे दुखों और कष्टों के मरहम।
जो वाहवाही नहीं लुटती बल्कि चाव से संजो के रखती है,
बीते खुशियों के दिन।
जिसका हर रूप जरुरी है बचा रहना,
रही-सही इंसानियत की मरम्मत के लिए।
माँ,
एक ऐसी कविता है, जिसके खत्म होते ही,
सालता है उसके आजीवन तिरस्कृत रह जाने का बोध।



 
 

कोई भी इसका जिम्मेदार नहीं


कोई भी इसका जिम्मेदार नहीं ,
तुम मेनू देखते हो, पर खा नहीं सकते,
तुम गद्दे देखते हो, पर उसपर बैठ नहीं सकते,
तुम सज़ा भुगतते हो, पर पाप नहीं कर सकते,
तुम भवन तैयार कर सकते हो, पर उसमें रह नहीं सकते,
तुम तेज दौड़ते हो, पर जीत नहीं सकते
तुम शिखर देख सकते हो, पर पहुँच नहीं सकते,
अंतिम पहेली तक हमेशा पहुँचते हो, पर सुलझा नहीं सकते,
ख्वाहिशों के बादल संजोते हो , पर ज़ाया बहने से बचा नहीं सकते
नियम तोड़ता कोई और है, तुम उफ्फ तक नहीं कर सकते
कोई भी इसका जिम्मेदार नहीं
न तुम, न मैं, न हम सभी
Courtsey : Google Images
असुरक्षा की गिरफ्त में कसे हम
मुट्ठी भर खुशियों को जोर से भींचे हम,
दो-चार सपनों से गुज़ारा करने वाले हम,
चाहते हैं, सारी उम्र यूँ ही कट जाए
डर की नींव पर खड़ी हमारी इमारत
हमेशा जोखिम देख डगमगा जाती है
और हर बार हम कहते हैं
कोई भी इसका जिम्मेदार नहीं
न तुम, न मैं, न हम सभी .

 

'तुम छूना मुझे'

तुम छूना मुझे
जब जिंदगी,
खेतों में उगी जंगली घास सी हो जाए...
तुम छूना मुझे.....
जब ज़िन्दगी,
बगीचे के गुलाबों के होश उडाती मौत की बदबू हो जाए...
तुम छूना मुझे.....
जब ज़िंदगी,
किसी कटे हुए पेड़ के सूखते पानी की तरह हो जाए...
तुम छूना मुझे.....
जब ज़िन्दगी,
गटर के किनारे लगे गपचुप के ठेले की अगरबत्ती की तरह हो जाए...
तुम छूना मुझे.....
जब ज़िन्दगी,
रबर की तरह तन जाए, हाथ से छूट जाए...
तुम छूना मुझे.....

हमेशा याद रखना
कि छूना है तुमको...
और स्पर्श मात्र से हो जाऊँगा मैं...
पुनः कर्मरत...
जिंदगी नाम की पहेली...
सुलझाने में.

 

Friday, October 26, 2012

एक पुरानी जोड़ी



 
डाक्टर से दिखा लिवाने के बाद
गाँव के उस चलताऊ होटल में
गर्मी और उमस से भरे दिन में
एक बड़े खम्बे वाले पंखे के नीचे
राधा ने बेपरवाह हो टिफिन खोला
और कौर बना-बना के धैर्य के साथ
गोपाल को खिलाने लगी
और खुद भी खाती रही..
जब-जब वह खिलाती..
उसकी आंखें चमक उठतीं थीं
वह भात भी बना सकती थी
मिठाइयाँ भी, हलवा-पूड़ी भी
पर उसने रोटियाँ और भुजिया ही बनाईं
अपंग गोपाल कुर्सी पर भावहीन बैठा रहा
चुपचाप खाता रहा...


pic : google

उनकी शादी को 30 साल हो गये हैं
आज ही उनकी शादी हुई थी.
राधा की आँखों की चमक
आज भी अबोध चंचलता लिए हुए हैं.
वह शब्दहीन प्रेम लिए हुए हैं.
जो गोपाल की मूक आँखों की
मुस्कान में....
आज भी देखने को मिल जाती है.
एक-दूसरे की आँखों में गोते लगाते
आज भी वे प्रेम में तर-बतर हैं.
 

प्रेम, जिसे कई तरह से समझने की कोशिश की गई, फिर भी कमबख्त चारो खाने चित्त कर दे...


कविता : प्रेम
 
प्रेम
एक बिल्ली है,
जो बारिश के बाद,
अपने ही घावों को चाटती है...
या एक राजकुमारी,
जो नमक के एक महल में रहती है,
और रो नहीं सकती...
या एक खिला फूल,
जिसे महज़ छू लेने भर से,
गमले में सजाया नहीं जा सकता....
प्यार हिरन की वे आँखें भी हैं,
जो सदा एक अबोध सवाल लिए,
संवेदना से लबलब टपकती रहती हैं...
या एक छोटा सा भालू,
जो शहद के खत्म हो जाने के बाद भी,
छत्ते से खेलना नहीं छोड़ता...
 
या लकड़ी का एक पहिया
जिसका काश्तकार
अपनी सारी जिंदगी उसकी
चिकनी गोलाई पर न्योछावर
कर देता है....