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Monday, February 18, 2013

मैं नहीं दे सकती उनका साथ



तीनों मेरी बगल में बैठते हैं,
कभी यह तो कभी वह,
पर रोज़ बैठते हैं,
कभी कोशिश करते हैं,
कभी बेशर्मी से जमा देते हैं तशरीफ,
जैसे कोई तार जुड़ा है अभेदी...
तीनों के बीच...

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 हजार कोशिशों के बावजूद,
जब मेरे जिस्म के किसी हिस्स्से का...
नहीं पाते स्पर्श,
तो अपनी निरी बुद्धि पर...
उन्हें सुखद आश्चर्य होता है,
चेहरे पर मन की गालियाँ लिखी होती हैं,
भावों में घृणा और तिरस्कार मिली होती है..

 कि मेरा जस का तस घर वापस आ जाना,
एक फतेह से कम नहीं होता.

 आप इन्हें
कैशोर्य, प्रौढ़ और वृद्ध कह सकते हैं...
तीनों मेरी मंजूरी के बगैर
मुझसे गुज़रना चाहते हैं-
एक मुकम्मल होने के लिए...
एक स्वयं को मांझने के लिए...
और आखिर अपने पछतावे को घुलाने के लिए.
 

 मेरी लाख कोशिशों के बावजूद-
मैं नहीं दे सकती उनका साथ,
क्योंकि जिनका गला खखार से भरा होगा   
वे, यही तीन होंगे.

कोई पूछता !

चावल,
बोरे में बचा था कुछ चावल,
चावल- जिससे मिटाते हैं भूख,
चावल बस एक समय का.

 इंतज़ार,
रात का इंतज़ार,
स्याह होने का इंतज़ार,
इंतज़ार-तारों का नहीं, सिगरेट के टुकड़ों का.

 उम्र,
मोमबती सी पिघलती उम्र,
उम्र के जाने के साथ जाती नौकरियाँ,
उम्र की कैद में सिमटी नौकरियाँ.

 उम्मीदें,
कूड़े के हवाले हैं उम्मीदें
उम्मीदें-जिनपर खड़ा है आदमी,
उम्मीदें-जिनपर लगे हैं संशय के जाले.

सवाल,
सब पूछते सवाल दर सवाल,
सवाल-जिसके लच्छे छोड़ चटखारे लेते आदमी,
सवाल- पढ़ाई खूब, नौकरी छोटी-मोटी?.

पूछता,
मुझसे कोई तो पूछता-
पूछता- कैसा लगता है
अर्जियों के जवाब में बंद, सपनों का इंतज़ार?
पूछता- कैसे कर सकता है
सपनों से थका आदमी किसी भी गुलामी का इंतज़ार?
पूछता- मुझ युवा पर दंभ भर्ती सरकार
कैसे कर सकती है योग्यताओं को तार-तार?
कैसे दे सकती है क्रूर दिलासों का व्यापार?
कि कोई तो जाए, गुहार दे, चीखे-चिल्लाए,
कि हमारे वोट पर ऐंठती सरकार!
टूट-फूट गए हैं हम, अब और न होता इंतज़ार.

(कविता को कोई नाम नहीं दे पाया, हो नहीं पाया)


माना मैं बड़ी नहीं,
इतनी कि फलसफे झाड सकूँ,
भावों के पूल खड़े कर,
जमा कर सकूँ,
तुम्हारी आँखों का पानी.

सुनो, ताज्जुब एक बेतुका शब्द है,
कि छोटे-छोटे सदमों को समोते-समोते,
ताज्जुबों को मिटाते-मिटाते,
अब हम ढीठ होते-होते ढह गए हैं,
सदमे अब चौंकाते नहीं, डर दे जाते हैं,
डर जो करने लगता है,

हमारी रही सही हिम्मत की पहरेदारी,
फिर एक दिन बहुत साफ स्पष्ट लिखा दीखता है- 
“मैं असहाय हूँ”,






अपनों के नक्काश हाँथ देते हैं पीड़ा,
पीड़ा जो महीन सूई की चूभन सी होती है,
मुझे आज़ादी दे,
हिसाब रखने को कहा जाता है,
बुलंद होने की दुहाई दे,
हिजाब रखने को कहा जाता है,
नक़ल-नक़ल में बेटी को बेटा कहा जाता है,
असल-असल में बेटी को बेटी की तरह ही सहा जाता है,
बहुत साफ है,
कोई करीबी नहीं होता ना ही दूर का होता है कोई,    
खून का रिश्ता या कोई भी, कुछ भी,
दूरी ही एक सच है,

दूरी जो अब छीपी-छिपी समझी-बूझी आदतों में शुमार है.

Wednesday, February 13, 2013

कुसूरवार कौन ?


तुमने उसे नहीं मारा,
न मैंने मारा है,
न जिस पर उठा है बबाल,  
उस सरकार ने दिया है इसे अंजाम,
वोट उसका कुसूरवार है.  
वोट जिसको फक्र है अपने निरपेक्ष होने का,
वोट जिसको अब भी है गुमान,  
कि वह  सर्वेसर्वा है,
कि जिसकी अंगुली की स्याही से लिखी जाती है तकदीरें,
उसकी तकदीर में नहीं होती है असल स्याही,  
ताकि वह अलीफ बे ते से के मारे
कुछ गर्म जेबों की बदल सके तकदीर.

 
मौत उसकी नहीं हुई है जो मरा है,
मरा तो यह देश है,
जिसके पिट्ठुओं ने,
वोट की एवज में कर दिया है उसका क़त्ल.   
मरा तो वह है,   
जिसकी आवाज़ जनपथ पार नहीं कर पाती,
जिसकी आवाज़ को नहीं मिल पाती गिलानी को मिली हुयी आवाज़,
जिसकी आवाज़ को “जख्मी सामूहिक अंतरात्मा” की आवाज़ की साज़िश के तहत....
गुमनामी, अफरा-तफरी में नाबूद कर दिया जाता है.

 वोट तो वह भी था,
जिसकी लाचारी और असहायता का फायदा उठा
वोटर लिस्ट और जीवन से हटा दिया गया उसका नाम
भयानक है ऐसा सोचना की हो रहा है यह,
वोटों की साजिश के तहत,
हिंसा परमो धर्मं: की सीख दे,
आदमखोरों में किया जा रहा है तब्दील,
बेशर्म सरकारें सफाई-गवाही देने में व्यस्त है,
वोट के अखाड़े में सर्वोच्च न्यायालय निरस्त-पस्त है.

   

 

 

कविता : आसां हो जाता


जैसे गाडी के आईने में दिख जाती हैं,
पीछे की आवाजाही,
वैसा कुछ भी तो नहीं होता असल जीवन में,
कि थोड़ा बगल हट लें, दे दें थोड़ी जगह,
स्मृतियों में फंसे उन ग्लानियों को...
जो तंग कर देतीं हैं आगे जाने का रास्ता....







जीवन के सड़क पर,
फँसी रह जाती हैं उदासियाँ, क्षोभ, हताशा, भूल में हुई भूल बनकर,
... जिन्हें मिल जाता जो थोड़ा भी किनारा,
तो सड़कें साफ हो जातीं
सफर कुछ-कुछ आसां हो जाता

 

Friday, November 23, 2012

एक गाँव : दो चित्र


 एक

जैसे हटा हो कोई पर्दा, 
वैसे छँट चुका है कोहरा,
आँखों के विस्तार की सीमा तक,
पसरी है हरियाली
आँखे भर लेना चाहती हैं हरियाली
साँसे भर लेना चाहतें हैं हरापन

ओस से लदे खेत,
सुबह की रौशनी में सन कर,
हीरे हुए जा रहे हैं.

आम के गाछ इधर 
ताड़ के पेड़ उधर
कर रहे तैयार एक मनोरम कैनवास. 

 


दो 

कैनवास में हैं वे भी शामिल,
जो मेरी मस्तिष्क के व्यर्थ विस्तार से अजान,
मफलर का मुरैठा बाँधे,
आग तापते, चुस्कियाँ लेते,
आँख मिलने पर मुस्की छोड़ते
शहर की कलाई मरोड़ते
कर रहे बतकही का  प्रचार-प्रसार
कि उनके लिए तो  धरी पड़ी है,
सारी सुंदरता, सारे विचार, सारा विस्तार.  

Thursday, November 22, 2012

मेरा राष्ट्र



कल झाडियों के पीछे-
एक जानवर को सड़ते हुए देखा
बीमार था, इसलिए..
कसाई ने कोई फायदा न बनता देख
लवारिस छोड़ दिया
पहले से ही बहुत फायदे उठा लिए गए,
उसे निचोड़ कर, काम करवाकर ।

उसकी देह से तीखी सड़ांध आ रही थी...
जिससे उसके गत भोग और अच्छे दिनों की..
बू आ रही थी ।
ऐसे-
कितने छोटे-छोटे जानवर रोज़ सड़ रहे हैं,
वैसे यह भी सड़ कर खोखला रह जायेगा..
एक दिन..
अपने अस्थिपंजर के साथ ।